प्यार और विश्वास का त्यौहार करवा चौथ रविवार को नारी पर्व


ब्यावरा (राजगढ़)। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाए जाने वाला सौभाग्यवती (सुहागिन) स्त्रियों का पर्व इस बार रविवार को यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4:00 बजे के बाद शुरू होकर रात्रि में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होगा
ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारिया करवा चौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती है। शास्त्रों के मुताबिक पति की दीर्घायु एवं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचंद्र गणेश जी की अर्चना की जाती है। करवा चौथ में भी संकष्टी गणेश चतुर्थी कि तरह दिनभर उपवास रखकर रात में चंद्रमा को अर्धय देने के उपरांत ही जल भोजन का विधान है।
वर्तमान समय में करवा चौथ व्रतोंत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथानुसार ही मनाती हैं, लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चंद्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं और चलनी में पति का मुख देखने के बाद अर्धय के साथ ही पति के हाथों जल ग्रहण करती है।
बता दे कि यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार प्रत्येक वर्ष किया जाता है।अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उघापन (उपसंहार) किया जाता है।जो सुहागिन स्त्रियां अजीवन रखना चाहे व जीवन भर इस व्रत को कर सकती है।इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत अन्य कोई दूसरा नही है।ऐसा माना जाता है कि यह व्रत सिर्फ विवाहिता स्त्रियो के लिए है,परंतु अविवाहित कन्याओ द्वारा भी इस व्रत को किए जाने के प्रमाण भी उपलब्ध है।”करवा” मिट्टी या धातु से बना हुआ लोटा के आकार का एक पात्र को कहते है जिसमे टोटी लगी हुई होती है।इस व्रत के साथ शिव पार्वती के उल्लेख की वजह से इसके अनादिकाल का पता चलता है।सम्पूर्ण भारत मे विशेष रूप से उत्तर पूर्वी भारत मे करवा चौथ का व्रत प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।करवे में पकवान भरे जाते है या चावल से बने व्यंजन भी रखे जाते हैं। इसी दिन शार्क प्रस्थपुर के वैध धर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती की कथा को सुनाया जाता है। जिसने यह व्रत किया था और पुनः अपने पति को प्राप्त किया था

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राजगढ़ ब्यावरा